Saturday, August 12, 2017

रानी से महारानी बनायी गयीं प्रफुल्ल कुमारी (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 55)


बस्तर के राजाओं को कठपुतली बनाये रखने के लिये अंग्रेजों को जो भी यत्न करना पड़ा उन्होंने निरंतर किया है। बस्तर राज्य की शासिका प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921 – 1936 ई.) का सम्बोधन 1 अप्रैल 1933 में “रानी” से बदल कर “महारानी” कर दिया गया। यह ब्रिटिश फैसला आश्चर्यजनक था चूंकि जिस राज्य को दोनों हाँथों से चूसा जा रहा हो उसे चर्चा का विषय बनाना अथवा महत्ता देना भी अंग्रेज क्यों चाहेंगे? राजा रुद्र प्रताप देव (1891 – 1921 ई.) के रहस्यमय देहावसान के बाद तथा राजकुमारी प्रफुल्ल के राज्यारोहण के बाद भी अंग्रेजों ने राज्याधिकार देने सम्बन्धी निर्णय को वैधानिक मान्यता देने में लम्बा समय लगाया। प्रफुल्ल कुमारी देवी को शासक स्वीकार करने से पूर्व असंतोष तथा पारिवारिक विवादों को हवा दी गयी। राजा की विधवा कुसुमलता, भाईयों के बेटों तथा ब्रिटिश अधिकारियों के बीच आपसी खींचतान लम्बे समय तक बनाये रखी गयी। प्रफुल्ल कुमारी देवी को राजा की एकमेव संतान होने के कारण वैध उत्तराधिकारी घोषित किया गया, किंतु यही उन्हें राज्याधिकार देने का एकमेव कारण नहीं था। अंग्रेज अब बस्तर पर अपनी सम्पूर्ण पकड चाहते थे, जिसके लिये उनकी मान्यता थी कि अल्पायु रानी को वे दबाव में रख सकेंगे। राजा के निधन के एक वर्ष बाद अर्थात 22.11.1922 को प्रफुल्ला को शासिका और रानी होने की मान्यता प्राप्त हुई थी।

अंग्रेजों को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में तीव्र होते स्वतंत्रता आंदोलनों के कारण अनेक तरह के दबावों का सामना करना पड रहा था। ऐसे में सैंकडों राजतंत्रों में बटे हुए भारत देश के राजा-रजवाडों को  अंग्रेज कभी दबाव डाल कर तो कभी सांकेतिक लाभ प्रदान कर अपनी जकडन में बनाये रखना चाहते थे। अंग्रेजों ने महारानी प्रफुल्ल के हाँथों में ऐसा शासन सौंपा जिसकी तकदीर या तो रायपुर में बैठ कर लिखी जाती या फिर शिमला, या देहली में। उनकी शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा इस तरह की गयी थी जिससे यह समझने में भूल न हो कि सम्राट जॉर्ज पंचम के शासन में देसी महाराजे-महारानियाँ केवल दिखावे का सामान हैं; कठपुतलियाँ हैं। ऐसे में महारानी सम्बोधन के अपने राजनीतिक मायने जो भी हों किंतु इससे उस दौर में बस्तर रियासत, अंग्रेजकालीन भारत के प्रमुख सामंती राज्यों में शुमार हो गया था। ‘महारानी’   सम्बोधन प्रदान किये जाने का एक कारण यह भी था कि बस्तर भौगोलिक दृष्टि से बडे भूभाग में विस्तृत था। इतनी भूमि मुख्यधारा में प्रभावशाली तथा तोपों की सलामी लेने वाले राजे-रजवाडों के पास भी नहीं थी।   

-  राजीव रंजन प्रसाद
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